Saturday, July 11, 2026

गवाही से उपचार तक: पीड़ा, उम्मीद और न्याय की ओर बैरवन की सामूहिक यात्रा


 

गवाही से उपचार तक: बैरवन की पीड़ा, उम्मीद और न्याय की सामूहिक यात्रा

जब लोगों ने अपनी कहानी सुनाई, तब केवल साक्ष्य नहीं बने—घाव भरने भी शुरू हुए

From Pain to Hope: Testimonial Therapy and the Healing Journey of Bairwan

The Bairwan stories are not merely accounts of police violence and forced displacement; they are stories of healing. Through Testimonial Therapy—a brief narrative therapy based on active listening, empathy, compassion, and justice—survivors found the courage to speak, communities rediscovered solidarity, and individual pain became a collective demand for dignity and human rights. These testimonies transformed silence into hope and trauma into resilience.

16 मई 2023 बैरवन गाँव के लोगों के लिए केवल एक तारीख नहीं है। यह वह दिन है जब खेतों में खड़ी फसलों के साथ-साथ लोगों का विश्वास भी रौंद दिया गया। यह वह दिन है जब विकास के नाम पर पुलिस बल, जेसीबी मशीनें और प्रशासनिक आदेश गाँव में पहुँचे, लेकिन उनके साथ संवाद नहीं आया; आया तो केवल भय, हिंसा, अपमान और असुरक्षा। उस दिन केवल जमीन पर कब्ज़ा नहीं हुआ, बल्कि लोगों की गरिमा, आजीविका और मानसिक शांति पर भी गहरा आघात पहुँचा।

लेकिन बैरवन की कहानी केवल हिंसा की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की कहानी भी है जिन्होंने अपने आँसू शब्दों में बदले, अपने डर को आवाज़ दी और अपनी गवाही के माध्यम से उपचार (Healing) की यात्रा शुरू की।

जब सुनना ही उपचार बन गया

घटना के बाद पीपुल्स विजिलेंस कमेटी ऑन ह्यूमन राइट्स (PVCHR) की टीम गाँव पहुँची। सबसे पहले किसी कानूनी दस्तावेज़ की नहीं, बल्कि इंसानों की ज़रूरत थी—ऐसे लोग जो बिना टोके, बिना निर्णय दिए, पूरी संवेदनशीलता से उनकी बात सुनें।

यहीं से शुरू हुई टेस्टिमोनियल थेरेपी (Testimonial Therapy) की प्रक्रिया।

यह केवल गवाही दर्ज करने की तकनीक नहीं है। यह सक्रिय श्रवण (Active Listening), सहानुभूति (Empathy), करुणा (Compassion), गरिमा (Dignity) और न्याय (Justice) पर आधारित एक संक्षिप्त नैरेटिव थेरेपी है। इसमें पीड़ित अपनी कहानी स्वयं कहते हैं। उनकी पीड़ा को बीच में रोका नहीं जाता, उनकी भावनाओं पर संदेह नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें सम्मानपूर्वक स्वीकार किया जाता है। यही स्वीकार्यता उपचार की पहली सीढ़ी बनती है।

एक गाँव, अनेक कहानियाँ—लेकिन दर्द एक ही था

जब कृष्णा प्रताप, जिन्हें पूरा गाँव छेदी प्रधान के नाम से जानता है, अपनी कहानी सुनाने लगे तो उनकी आँखों में केवल चोट का दर्द नहीं था, बल्कि अपमान की पीड़ा भी थी। दो बार ग्राम प्रधान रहे इस बुज़ुर्ग ने केवल इतना कहा था कि उस दिन गाँव में एक युवक की मृत्यु हुई है, इसलिए सीमांकन किसी और दिन कर लिया जाए। उनकी बात अनसुनी कर दी गई। जेसीबी टमाटर की फसल पर चढ़ा दी गई। जब वे किसानों की फसल बचाने के लिए मशीन के सामने खड़े हुए तो पुलिस ने उन्हें घेरकर इतना पीटा कि उनकी आँख फट गई, जबड़ा घायल हो गया और पूरा शरीर लहूलुहान हो गया। उन्हें सबसे अधिक चोट इस बात ने पहुँचाई कि जिस गाँव ने उन्हें सम्मान दिया, उसी गाँव के सामने उन्हें अपराधी की तरह पीटा गया।

आशा देवी जब अपनी गवाही देती हैं तो बार-बार रुक जाती हैं। उनकी आँखों से आँसू निकल आते हैं। वे बताती हैं कि उन्होंने अपने पति को पुलिस के डंडों से टूटे हाथ और बेहोश हालत में बगीचे में पड़ा पाया। इलाज के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपने कानों के सोने के झुमके बेच दिए। डेढ़ लाख रुपये का इलाज, कर्ज का बोझ और पति की स्थायी विकलांगता आज भी उनके जीवन का हिस्सा है। लेकिन उनसे भी गहरा घाव उनके मन में है। वे कहती हैं—"पुलिस ने बेवजह हमें मारकर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया।"

बबलू की कहानी पूरे समुदाय के प्रश्न में बदल जाती है। पुलिस उन्हें दौड़ाकर पकड़ती है, बेरहमी से पीटती है, थाने ले जाती है, मेडिकल करवाकर जेल भेज देती है। पूरी रात हवालात में बैठकर वे केवल एक ही बात सोचते रहे—"साहब, हमारी गलती क्या थी?" अठारह दिन जेल में रहने के बाद भी उनका डर खत्म नहीं हुआ। आज भी उन्हें रात में नींद नहीं आती और उन्हें लगता है कि कहीं फिर से उन्हें अपराधी न बना दिया जाए।

हरिशंकर की कहानी बताती है कि हिंसा केवल घायल लोगों तक सीमित नहीं रहती; वह पूरे परिवार को अपनी चपेट में ले लेती है। उनका बेटा दौड़ते हुए घर पहुँचा और बोला—"भाग जाइए, पुलिस सबको मार रही है।" उसके बाद महिलाएँ घर में बंद हो गईं, पुरुष खेतों में छिप गए और पुलिस ने घर का दरवाज़ा तोड़ दिया। बाद में जब 200 अज्ञात लोगों पर मुकदमा और 11 लोगों की गिरफ्तारी की खबर मिली, तो उन्होंने अपनी तीनों बहुओं को मायके भेज दिया। वे कहते हैं कि उस दिन के बाद अपना ही घर जेल जैसा लगने लगा।

जयनारायण उपाध्याय, गाँव के बुज़ुर्ग पुरोहित, इस संघर्ष का लंबा इतिहास बताते हैं। वे याद दिलाते हैं कि यह संघर्ष केवल एक दिन का नहीं, बल्कि वर्षों से चल रही भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया, अधूरे मुआवज़े और न्यायालयों में चल रही लड़ाई का परिणाम है। उनके शब्दों में आज भी सबसे बड़ा भय यही है—"अभी भी डर है कि प्रशासन हमारी जमीन और घर सब कुछ ले लेगा।"

जगरानी के लिए पुलिस का घर में घुसना, दरवाज़ा तोड़ना और उन्हें पीटना केवल शारीरिक हिंसा नहीं थी। उनके पति को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। वे बताती हैं कि कई दिनों तक उन्हें हर आवाज़ पर लगता था कि पुलिस फिर आ जाएगी। आज भी उन्हें रात में नींद नहीं आती।

जय शंकर की बेटी की शादी को केवल दो दिन हुए थे। घर में रिश्तेदार थे। पुलिस आई, उन्हें और उनके बेटे को उठा ले गई। थाने में पीटा गया, फिर धमकी दी गई कि अदालत में मारपीट की बात बताई तो जेल से जल्दी नहीं छूटोगे। जेल में उन्हें नाली साफ करने और झाड़ू लगाने पर मजबूर किया गया। वे कहते हैं कि जेल की दीवारों से ज़्यादा उन्हें उस अपमान ने तोड़ा जो निर्दोष होते हुए भी उन्हें अपराधी की तरह झेलना पड़ा।

लालमनी देवी, एक 69 वर्षीय विधवा, खेत में काम कर रही थीं जब उन्होंने देखा कि पुलिस एक महिला को उठाकर पटक रही है। भय में भागते समय वे गिर पड़ीं और घायल हो गईं। बाद में वे एक घर में भूखी-प्यासी छिपी रहीं। आज भी वे ठीक से चल नहीं पातीं और कहती हैं कि उन्हें लगा था कि एक लाठी और पड़ती तो शायद वे बचती नहीं।

निशा देवी अपने दो छोटे बच्चों को लेकर घर के एक कोने में दुबक गई थीं। पुलिस ने दरवाज़ा तोड़ दिया, उनके बेटे को थप्पड़ मारा और घर का सामान बिखेर दिया। घटना के बाद वे बीस दिनों तक मायके में रहीं। उनका छोटा बेटा आज भी पूछता है—"क्या हमें फिर से घर से निकाल दिया जाएगा?" इस सवाल का जवाब किसी माँ के पास नहीं होता।

प्यारेलाल को पुलिस उनके घर से घसीटकर बाहर लाई और इतनी बेरहमी से पीटा कि उनका पैर टूट गया और वे बेहोश हो गए। उनकी पत्नी और घर की महिलाएँ जब बाहर आईं तो उन्हें लगा जैसे कोई शव पड़ा हो। उनके लिए सबसे बड़ा दर्द यह था कि उनके अपने घर की चौखट पर उनकी गरिमा कुचल दी गई।

ये केवल दस लोगों की कहानियाँ नहीं थीं। कुल 21 लोगों की टेस्टिमोनियल थेरेपी के दौरान दर्ज गवाहियाँ एक-दूसरे से अलग होते हुए भी एक साझा सच कहती थीं—पुलिस हिंसा ने केवल शरीरों को नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के मनोविज्ञान को घायल कर दिया था।

जब गवाही उपचार बनने लगी

टेस्टिमोनियल थेरेपी के दौरान अधिकांश लोग पहली बार अपनी पूरी कहानी बिना भय के सुना पा रहे थे। कई लोग बोलते-बोलते रो पड़े। कुछ देर तक मौन रहे। कुछ बार-बार पूछते थे कि क्या उनकी बात सचमुच लिखी जाएगी।

जब उनकी कहानियाँ लिखी गईं और बाद में उन्हें सम्मानपूर्वक पढ़कर सुनाई गईं, तो कई लोगों ने कहा कि पहली बार उन्हें लगा कि उनकी पीड़ा किसी ने समझी है। यह केवल दस्तावेज़ नहीं था; यह उनके अस्तित्व की सार्वजनिक स्वीकृति थी।

धीरे-धीरे लोगों ने महसूस किया कि वे केवल पीड़ित नहीं हैं। वे अधिकार-धारक हैं। उनकी कहानी केवल उनका निजी दुख नहीं, बल्कि लोकतंत्र और मानवाधिकारों का प्रश्न है।

गवाही से न्याय की ओर

इन गवाहियों के आधार पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत की गई, गाँव में फोक स्कूल आयोजित हुए, टोल-फ्री शिकायतें दर्ज कराई गईं, समुदाय को संगठित किया गया और लगातार अनुवर्ती कार्रवाई की गई। यही प्रक्रिया आगे चलकर राहत और मुआवज़े की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हुई। कुछ परिवारों को मुआवज़ा मिला, न्यायालय से राहत मिली और संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली, हालांकि सभी प्रभावित परिवारों को अभी भी समान न्याय और पुनर्वास की प्रतीक्षा है।

उपचार अभी जारी है

बैरवन में आज भी कुछ लोग पुलिस की वर्दी देखकर घबरा जाते हैं। कई लोग रात में ठीक से नहीं सो पाते। बच्चों के मन में अब भी डर है। बुज़ुर्ग आज भी खेतों की ओर जाते हुए पीछे मुड़कर देखते हैं।

फिर भी एक बड़ा परिवर्तन आया है।

अब लोग चुप नहीं हैं।

अब वे अपनी कहानी कहते हैं।

अब उन्हें पता है कि उनकी आवाज़ दर्ज हो चुकी है।

और शायद यही उपचार की सबसे बड़ी शुरुआत है।

बैरवन हमें यह सिखाता है कि उपचार केवल अस्पतालों में नहीं होता। उपचार तब शुरू होता है जब किसी की पीड़ा को सम्मानपूर्वक सुना जाए, उस पर विश्वास किया जाए और उसे न्याय की प्रक्रिया से जोड़ा जाए।

टेस्टिमोनियल थेरेपी ने बैरवन के लोगों को उनका खोया हुआ आत्मविश्वास लौटाने की दिशा में पहला कदम रखा। इन गवाहियों ने केवल मानवाधिकार उल्लंघन का दस्तावेज़ तैयार नहीं किया; इन्होंने टूटे हुए लोगों को फिर से खड़ा होने का साहस दिया।

पीड़ा ने उन्हें तोड़ा था। गवाही ने उन्हें जोड़ा। आशा ने उन्हें संभाला। और न्याय की तलाश आज भी उनकी यात्रा को आगे बढ़ा रही है।











From Silence to Strength: The Healing Journey of Telling Their Stories Part 1


“पुलिस ने बेवजह हमें मारकर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ दिया” — आशा देवी की आपबीती

Asha Devi's testimony reflects the devastating human cost of forced land acquisition and excessive police action in Bairwan village. Beyond physical injuries, the incident pushed her family into deep debt, psychological trauma, and long-term insecurity. Her story reminds us that compensation alone cannot heal the wounds caused by violence and the loss of dignity.

“पुलिस ने बेवजह हमें मारकर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ दिया” — आशा देवी की गवाही

मेरा नाम आशा देवी है। मेरी उम्र 48 वर्ष है। मेरे पति का नाम सुरेन्द्र है। हमारे परिवार में चार बच्चे हैं—एक बेटा और तीन बेटियाँ, जिनमें एक बेटी की शादी हो चुकी है। मैं दिहाड़ी मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण करती हूँ। मैं ग्राम बैरवन, थाना रोहनिया, जिला वाराणसी की रहने वाली हूँ।

16 मई 2023 का वह दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे भयावह दिन था, जिसे मैं आज भी भूल नहीं पाई हूँ। उस सुबह लगभग सात बजे भारी पुलिस बल सात जेसीबी मशीनों के साथ हमारे खेत पर पहुँचा और हमारी ज़मीन से मिट्टी निकालने लगा। इसकी सूचना मिलते ही मैं और मेरे पति खेत पर पहुँचे। वहाँ का दृश्य देखकर हमारे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पुलिस पहले से ही गाँव के लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर बेरहमी से पीट रही थी।

यह देखकर मैं डर के मारे पड़ोस में रहने वाली सुखई देवी के घर में छिप गई, ताकि पुलिस की नज़र मुझ पर न पड़े। मेरे पति भी अपने बचाव के लिए छिपने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन तभी लगभग 15–20 पुलिसकर्मियों ने उन्हें घेर लिया और लाठी-डंडों से निर्ममता से पीटना शुरू कर दिया। वे दर्द से चीखते रहे, दया की गुहार लगाते रहे, लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी। पुलिस ने इतनी बेरहमी से हमला किया कि उनके हाथ की दो जगह हड्डियाँ टूट गईं। उनके पैरों, कमर और पूरे शरीर पर लगातार लाठियाँ बरसाई गईं। गंभीर चोटों के कारण वे ज़मीन पर गिर पड़े और बेहोश हो गए। इसके बाद पुलिस ने अन्य ग्रामीणों को पीटना शुरू कर दिया।

मैं घर के भीतर बैठी रोती-बिलखती रही। मन बार-बार पति की मदद के लिए दौड़ पड़ने को कहता था, लेकिन बाहर निकलने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। मुझे डर था कि यदि मैं बाहर गई तो पुलिस मुझे भी मार डालेगी। उस समय पुलिस का व्यवहार किसी कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली संस्था जैसा नहीं, बल्कि हिंसक भीड़ जैसा था। मैं पूरी तरह असहाय थी। यदि मेरे साथ भी कुछ हो जाता, तो मेरे घायल पति और बच्चों की देखभाल कौन करता?

शाम लगभग पाँच बजे जब पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया, तब मैं और सुखई देवी बाहर निकले। पुलिस जा चुकी थी। हम अपने पति को खोजने लगे। कुछ दूर बगीचे में वे बेहोश पड़े मिले। उन्हें उस हालत में देखकर मैं फूट-फूटकर रोने लगी। मेरी आवाज़ सुनकर पड़ोसियों ने मेरे बेटे को बुलाया। हम दोनों माँ-बेटे ने किसी तरह उन्हें ऑटो से बनारस के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. रामविलास के पास पहुँचाया।

एक्स-रे कराने पर डॉक्टर ने बताया कि उनके हाथ की दो जगह हड्डियाँ टूट चुकी हैं और हाथ में रॉड डालनी पड़ेगी। यह सुनकर हमारे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सबसे बड़ी चिंता इलाज के खर्च की थी। पूरे गाँव में तब हर परिवार संकट से गुजर रहा था। उस समय मेरे कानों में सोने के झुमके थे। मैंने उन्हें उतारकर अपने बेटे को दिए और कहा कि किसी सुनार के यहाँ बेचकर इलाज के लिए पैसे लेकर आए। झुमके बेचने पर ₹25,000 मिले, जिससे अस्पताल में भर्ती और उपचार शुरू हो सका।

मैं चार दिनों तक अस्पताल में पति के सिरहाने बैठी रही। हर पल भगवान से यही प्रार्थना करती रही कि उनकी जान बच जाए। 20 मई 2023 को उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिली, लेकिन उनके हाथ में दो जगह रॉड डाली जा चुकी थी। इलाज पर लगभग ₹1.5 लाख खर्च हो गए। यह राशि जुटाने के लिए हमें कर्ज लेना पड़ा और आज भी हम उस कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं।

घटना के बाद हमारे जीवन की दिशा ही बदल गई। पति अब पहले की तरह मेहनत-मजदूरी नहीं कर पाते। उनके हाथ और शरीर में आज भी लगातार दर्द बना रहता है। परिवार की आमदनी लगभग समाप्त हो गई है और आर्थिक संकट ने हमें पूरी तरह तोड़ दिया है।

लेकिन सबसे गहरा घाव हमारे मन पर है। आज भी जब उस दिन की घटना याद आती है, तो हाथ-पैर काँपने लगते हैं। वह भयावह दृश्य मेरी आँखों के सामने ताज़ा हो जाता है। अब घर से बाहर निकलने में भी डर लगता है। हर समय मन में असुरक्षा और भय बना रहता है। ऐसा लगता है मानो हमारी पूरी दुनिया उसी दिन बिखर गई।

मैं आज भी यही सवाल करती हूँ कि हमारा अपराध क्या था? अपनी ही ज़मीन पर खड़े होकर उसे बचाने की कोशिश करना क्या अपराध है? पुलिस ने बिना किसी कारण हमारे परिवार को शारीरिक रूप से घायल किया, मानसिक रूप से तोड़ दिया और आर्थिक रूप से बर्बाद कर दिया।

मैं चाहती हूँ कि इस अमानवीय घटना के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई हो, ताकि हमें न्याय, सुरक्षा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिल सके।


“साहब, हमारी गलती क्या थी? लेकिन पुलिस ने मेरी एक भी नहीं सुनी” — बबलू की आपबीती

Bablu's testimony exposes the devastating consequences of excessive police force during the Bairwan land acquisition conflict. What began as a peaceful attempt to protect his ancestral land ended in brutal assault, arbitrary arrest, eighteen days of imprisonment, and lasting psychological trauma. His story illustrates how the criminalisation of peaceful protest can destroy livelihoods, dignity, and faith in justice.

“साहब, हमारी गलती क्या थी? लेकिन पुलिस ने मेरी एक भी नहीं सुनी” — बबलू की गवाही

मेरा नाम बबलू है। मेरी उम्र 38 वर्ष है। मेरे पिता का नाम छन्नू लाल है। मैं ग्राम बैरवन, पोस्ट गंगापुर, थाना रोहनिया, जिला वाराणसी का निवासी हूँ। मैं दिहाड़ी मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। हमारी पुश्तैनी जमीन ही हमारे जीवन और आजीविका का आधार रही है।

16 मई 2023 का दिन मेरे जीवन का सबसे भयावह दिन बन गया। उस दिन पुलिस और प्रशासन के अधिकारी हमारी जमीन पर जबरन कब्जा करने और अधिग्रहण की कार्रवाई कर रहे थे। मैं अपनी बाग की जमीन पर खड़ा होकर केवल इतना कह रहा था कि हमारी बात सुनी जाए और बिना उचित प्रक्रिया के हमारी जमीन न ली जाए। लेकिन शांतिपूर्ण विरोध करने के बजाय पुलिस ने हम ग्रामीणों पर लाठीचार्ज शुरू कर दिया।

मैं अपनी जान बचाने के लिए वहाँ से हटने की कोशिश कर ही रहा था कि पुलिसकर्मियों ने दौड़ाकर मुझे पकड़ लिया। इसके बाद उन्होंने लाठी-डंडों से इतनी बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया कि मेरे पूरे शरीर के जोड़-जोड़ में चोटें आ गईं। मैं बार-बार हाथ जोड़कर पूछ रहा था—"साहब, हमारी गलती क्या है?" लेकिन मेरी किसी ने नहीं सुनी। पुलिस लगातार मुझे पीटती रही, मानो मैंने कोई गंभीर अपराध किया हो।

मारपीट के बाद मुझे रोहनिया थाने ले जाया गया। शाम लगभग छह बजे मुझे सरकारी अस्पताल, मिसिरपुर, में मेडिकल परीक्षण के लिए ले जाया गया। मेडिकल के बाद फिर से थाने लाया गया और उसी रात लगभग 11 बजे मुझे कैंट थाने ले जाकर हवालात में बंद कर दिया गया।

उस रात मैं पूरी रात जागता रहा। मेरे मन में केवल एक ही सवाल बार-बार उठ रहा था—मैंने ऐसा कौन-सा अपराध किया है जिसकी इतनी बड़ी सजा मुझे दी जा रही है? जिस जमीन ने वर्षों तक मेरे परिवार का पेट भरा, आज उसी जमीन की रक्षा करने पर मुझे अपराधी बना दिया गया। ऐसा लग रहा था कि प्रशासन हमारी जमीन ही नहीं, बल्कि हमारा सम्मान और अधिकार भी छीन लेना चाहता है।

अगले दिन सुबह लगभग 11 बजे पुलिस मुझे न्यायालय में पेश करने के लिए कचहरी ले गई। वहाँ से मुझे चौकाघाट जिला कारागार भेज दिया गया। मेरे जेल जाने के बाद मेरा परिवार मेरी जमानत के लिए लगातार कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाता रहा। आखिरकार 18 दिन बाद मुझे जमानत मिली और मैं जेल से बाहर आ सका।

जेल से लौटने के बाद जीवन पहले जैसा कभी नहीं रहा। बेवजह गिरफ्तारी, मारपीट और जेल की यातना ने मुझे भीतर तक तोड़ दिया। आज भी यह सोचकर पीड़ा होती है कि अपनी ही जमीन की रक्षा करने पर मेरे साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया। इस घटना ने मेरे आत्मसम्मान और आत्मविश्वास दोनों को गहरी चोट पहुँचाई है।

घटना के बाद हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति भी बुरी तरह प्रभावित हुई। मजदूरी का काम छूट गया और आय का मुख्य स्रोत समाप्त हो गया। आज भी समझ में नहीं आता कि परिवार का पालन-पोषण कैसे करूँ। मन हर समय उदास रहता है। किसी काम में मन नहीं लगता। रातों को नींद नहीं आती और लोगों से मिलने-जुलने का भी मन नहीं करता। जेल में बिताए वे अठारह दिन आज भी मेरी स्मृतियों में एक दुःस्वप्न की तरह बसे हुए हैं।

सबसे अधिक भय इस बात का है कि यदि भविष्य में प्रशासन फिर से हमारी जमीन पर कब्जा करने आया, तो हमारे साथ दोबारा वही सब कुछ हो सकता है। यह डर आज भी मेरे परिवार के साथ हर दिन जीता है।

मैं केवल इतना चाहता हूँ कि जिन लोगों ने हमारे साथ यह अमानवीय व्यवहार किया, उनके खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई हो। कानून का पालन करने वाले नागरिकों को अपराधी की तरह नहीं, बल्कि सम्मान और न्याय के साथ देखा जाना चाहिए। यदि दोषियों को जवाबदेह नहीं ठहराया गया, तो भविष्य में भी निर्दोष लोगों के साथ ऐसी घटनाएँ दोहराई जाती रहेंगी।

मेरी यही मांग है कि मुझे और मेरे जैसे सभी पीड़ितों को न्याय मिले तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी नागरिक को अपनी ही जमीन और अपने अधिकारों की रक्षा करने की कीमत पुलिस की बर्बरता और जेल की यातना के रूप में न चुकानी पड़े।


“मेरा बेटा दौड़ते हुए आया और बोला—‘घर छोड़कर भाग जाइए, पुलिस सबको दौड़ा-दौड़ाकर मार रही है’” — हरिशंकर की आपबीती

Harishankar's testimony captures the atmosphere of fear that engulfed Bairwan village during the police action of 16 May 2023. His family's peaceful life, built around flower cultivation, was shattered overnight as police raids, forced entry into homes, and mass arrests created an environment of terror. His story demonstrates that the impact of state violence extends far beyond physical injuries, leaving families trapped in fear, economic uncertainty, and psychological trauma.

“मेरा बेटा दौड़ते हुए आया और बोला—‘घर छोड़कर भाग जाइए, पुलिस सबको दौड़ा-दौड़ाकर मार रही है’” — हरिशंकर की गवाही

मेरा नाम हरिशंकर है। मेरी उम्र 60 वर्ष है। मैं ग्राम बैरवन, मोहनसराय, पोस्ट गंगापुर, ब्लॉक एवं तहसील राजातालाब, थाना रोहनिया, जिला वाराणसी का निवासी हूँ। मेरे परिवार में कुल 13 सदस्य हैं। मेरी पत्नी सावित्री गृहिणी हैं और घर के काम के साथ-साथ फूलों की खेती में मेरा हाथ बँटाती हैं। हमारी फूलों की खेती ही हमारे परिवार की आजीविका का मुख्य आधार है और इसी से हमारे बच्चों का पालन-पोषण तथा घर का खर्च चलता है।

16 मई 2023 का दिन हमारे परिवार और पूरे गाँव के लिए ऐसा भयावह दिन था, जिसे हम जीवनभर नहीं भूल सकते। उस दिन सुबह हम सब घर पर बैठकर फूलों की गुथाई का काम कर रहे थे। तभी अचानक मेरा बेटा सदानंद घबराया हुआ दौड़ता हुआ घर पहुँचा। उसकी साँसें तेज चल रही थीं और चेहरे पर भय साफ दिखाई दे रहा था। उसने हाँफते हुए कहा—

"आप लोग घर छोड़कर भाग जाइए, पुलिस सभी को दौड़ा-दौड़ाकर मार रही है। मुझे भी डंडों से मारा है। मेरा हाथ बहुत दर्द कर रहा है और पीठ पर भी गंभीर चोट लगी है।"

इतना कहकर वह मोटरसाइकिल की चाबी उठाकर वहाँ से निकल गया, ताकि किसी तरह अपनी जान बचा सके।

बेटे की बात सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मैं भी भय के कारण तुरंत घर से निकलकर खेतों की ओर छिपने चला गया। मेरी पत्नी, बेटियाँ और बहुएँ घर के अंदर दरवाजा बंद करके बैठ गईं। कुछ ही देर बाद पुलिस हमारे घर पहुँची। उन्होंने दरवाजा तोड़कर घर के भीतर प्रवेश किया और पूरे घर की तलाशी ली। जब उन्हें कोई पुरुष नहीं मिला, तब वे वापस लौट गए। घर के भीतर मौजूद महिलाओं पर उस समय जो बीती, उसे शब्दों में बयान करना आसान नहीं है। वे भय से काँप रही थीं और समझ नहीं पा रही थीं कि अगला पल क्या लेकर आएगा।

मैं खेतों में छिपा हुआ था, लेकिन मन बार-बार घर की ओर जा रहा था। पत्नी, बेटियों और बहुओं की चिंता मुझे अंदर ही अंदर बेचैन कर रही थी। यह नहीं पता था कि पुलिस उनके साथ कैसा व्यवहार कर रही होगी।

काफी देर बाद जब गाँव में कुछ शांति हुई, तब मैं घर लौटा। लौटने पर पता चला कि पुलिस ने पूरे गाँव में यह घोषणा कर दी है कि करीब 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है और 11 ग्रामीणों को गिरफ्तार कर लिया गया है। यह खबर सुनते ही पूरे गाँव में दहशत फैल गई। किसी को नहीं पता था कि अगली गिरफ्तारी किसकी होगी। हर परिवार अपने भविष्य को लेकर भयभीत था।

स्थिति इतनी भयावह हो गई कि हमने अपनी तीनों बहुओं को सुरक्षा के लिए उनके मायके भेज दिया, ताकि वे कम-से-कम इस डर और तनाव से दूर रह सकें। उस समय अपने ही घर में रहना, खाना और सोना तक मुश्किल हो गया था। हर आहट पर लगता था कि शायद पुलिस फिर से आ गई है और अब हमें भी गिरफ्तार कर ले जाएगी। कई दिनों तक पूरा गाँव दहशत के साये में जीता रहा। लोग घरों से निकलने से डरते थे, मजदूरी और खेती का काम लगभग ठप हो गया था और पूरे गाँव का सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो गया।

आज भी जब मैं उस दिन को याद करता हूँ, तो मन व्यथित हो उठता है। भगवान ऐसा दिन किसी को न दिखाए। उस एक दिन ने हमारे जीवन की शांति छीन ली। अब हर समय यही चिंता बनी रहती है कि कहीं हमारी फूलों की खेती भी हमसे न छीन ली जाए। यही खेती हमारे परिवार की आजीविका का आधार है। मैंने और मेरी पत्नी ने वर्षों की मेहनत से इस जमीन को उपजाऊ बनाया है। इसी की आय से हमारे बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और पूरे परिवार का जीवन चलता रहा है।

पहले हम अपनी मेहनत की कमाई से संतुष्ट और सम्मानपूर्वक जीवन जी रहे थे, लेकिन अब हर दिन चिंता और असुरक्षा के साथ गुजरता है। गाँव में पुलिस की उस कार्रवाई ने केवल कुछ लोगों को नहीं, बल्कि पूरे समुदाय को भय और अस्थिरता में धकेल दिया। आज भी किसी को यह भरोसा नहीं है कि कल किसके घर पुलिस पहुँच जाएगी या किसकी जमीन अगली होगी।

मैं केवल इतना चाहता हूँ कि जिन लोगों ने हमारे गाँव और हमारे परिवारों के साथ यह अन्याय किया, उनके खिलाफ निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई हो। हमें न्याय मिले, हमारी सुरक्षा सुनिश्चित हो और हमारे संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी किसान या ग्रामीण को अपनी ही जमीन और अपने ही घर में भय के साथ जीने के लिए मजबूर न होना पड़े।