मेरा नाम अर्चना देवी उम्र- 25 वर्ष, है। मै ग्राम- धनसिरिया, पो०
राजगढ़, थाना
राजगढ़, तहसील मड़िहान, जिला
मिर्जापुर की निवासी हूँ। मै (अनुसूचित जाति)हूँ| मै
अपने परिवार का पेट पालने के लिए धान काटना मिर्चा तोड़ना और मनरेगा जैसी मजदूरी करती हूँ। मेरे दो छोटे बच्चे हैं| रोहित जिसकी उम्र- 5 वर्ष, है
और आरुष जिसकी उम्र- केवल 1 वर्ष है। गरीबी के बीच पूरा जीवन मेहनत और संघर्ष में बीत रहा था| लेकिन परिवार साथ था, यही
सबसे बड़ी ताकत थी।
दिनांक 06-06-2025 को अचानक मेरे मोबाइल पर गुर्गा, जिला-
जेल सोनभद्र के जेलर का फोन आया। फोन पर बताया गया कि तुम्हारे पति विनोद कुमार की तबीयत बहुत खराब है और उन्हें जिला अस्पताल रॉबर्ट्सगंज से बी.एच.यू. वाराणसी रेफर किया गया है। यह सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मै जोर-जोर से रोने और चिल्लाने लगी। मेरी आवाज सुनकर घर के लोग—देवरानी, सास
और देवर—भागते हुए आए। मै रोते चीखते चिल्लाते हुए सारी बात बताई। मेरे मन में सिर्फ यही डर था कि मेरे पति को क्या हो गया है और मैं उन्हें बचा पाएगी या नहीं।
कुछ देर बाद एक पुलिस वाला आया और मुझे और मेरे छोटे बेटे आरुष को सरकारी बस से टेंगड़ा मोड़ होते हुए बी.एच.यू. वाराणसी ले गये। जब मै अस्पताल पहुँची तो मैंने देखा कि मेरे पति इमरजेंसी में बेहोश पड़े थे। मैं बिल्कुल अकेली थी और घबराहट से मेरा दिल तेज-तेज धड़क रहा था। दो दिन तक मेरे पति नई बिल्डिंग के आईसीयू में बेहोश रहे। उसके बाद उन्हें 6वीं मंज़िल पर शिफ्ट कर दिया गया, जहाँ
लगातार उनका इलाज चलता रहा।
पाँचवें दिन जब उन्हें होश आया तो मैं परिवार की महिलाओं के साथ उनसे मिलने गई। जैसे ही मेरे पति ने मुझे देखा, वह
फूट-फूटकर रोने लगे। रोते हुए उन्होंने कहा कि पुलिस ने उन्हें बहुत मारा है और उनकी जिंदगी बर्बाद कर दी है। उस समय वहाँ मौजूद एक पुलिस महिला लगातार वीडियो और फोटो बना रही थी। मेरे पति ने बताया कि पुलिस ने उनके सीने और शरीर पर बेरहमी से लाठी चलाई, जिससे उन्हें असहनीय दर्द हो रहा था। बाद में उन्हें पुराने अस्पताल ले जाया गया| जहाँ
उन्हें खून की उल्टी हुई। नर्स और पुलिस आपस में मिलकर सारी फोटो और वीडियो डिलीट करवा देते थे और उन्हें गंदी-गंदी गालियाँ देकर डराते थे कि ज्यादा मत बोलना, नहीं
तो यही हाल फिर करेंगे। मैं जब भी मिलने जाती, पुलिस मुझे बाहर भगा देती थी और मैं दरवाजे के बाहर खड़ी होकर तड़पती रहती थी।
डॉक्टरों ने अनार का रस और पतली खिचड़ी लाने को कहा, लेकिन मेरे पास एक भी पैसा नहीं था। मैंने पुलिस से मदद माँगी तो उन्होंने साफ कह दिया कि खाने-पीने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है। जब मैंने जेलर से शिकायत की तो उसने भी यही कहा कि यह उसकी जिम्मेदारी नहीं है और मेरा मोबाइल नंबर ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। मुझे डर लगने लगा कि कहीं मेरे पति के साथ-साथ मेरी और मेरे बच्चों की जान भी न चली जाए। मजबूरी में मैं बाहर-बाहर लोगों से हाथ जोड़कर माँगने लगी, ताकि
किसी तरह मेरे पति और मेरे बच्चों की जान बचा सके।
कुछ दिनों बाद मुझे खुद तेज बुखार हो गया। मैं इलाज कराने भाई के घर गई और फिर वापस बी.एच.यू. पहुँची। जब मैं अस्पताल लौटी तो देखा कि मेरे पति की हालत बहुत ज्यादा खराब हो चुकी थी। रिश्तेदार और मेरी सास भी देखने आए, लेकिन कुछ समय बाद सभी वापस घर चले गए। अस्पताल में मैं अकेली रह गई, अपने
पति के पास, डर
और बेबसी के साथ।
दिनांक 25-06-2025 की रात लगभग 1 बजे एक पुलिस वाले ने मुझे जगाया और नीचे चलने को कहा। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। नीचे पहुँचकर मैंने देखा कि मेरे पति स्ट्रेचर पर मृत अवस्था में पड़े थे। यह दृश्य देखते ही मैं उनके शरीर से लिपट गई और जोर-जोर से रोने लगी, लेकिन अब वे इस दुनिया में नहीं थे। मुझे लगा कि मेरी भी जान चली जाएगी। पुलिस मुझे अंदर ले गई और मुझसे जबरन हस्ताक्षर करवाने लगी। मेरी अनुमति के बिना ही मेरे पति के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।
शाम लगभग 7 बजे एम्बुलेंस से शव घर पहुँचा। पूरा परिवार रोने-पीटने लगा। मैं बार-बार बेहोश हो जाती थी। लगभग 15 दिनों तक मेरा शरीर पूरी तरह टूट चुका था। न मुझे खाना अच्छा लगता था, न
पानी, और
न ही नींद आती थी। मेरे छोटे-छोटे बच्चे भी डर और बीमारी से परेशान हो गए थे।
मैंने बताया कि मेरे पति को पुलिस ने रास्ते में पकड़कर चोपन थाने में बंद किया था और उन पर फर्जी गौ-हत्या का केस लगाकर जेल भेज दिया गया था। उन्हें छुड़ाने के लिए मैंने अपने सारे गहने बेच दिए और रिश्तेदारों से कर्ज लिया, लेकिन पुलिस की मारपीट और अत्याचार के कारण मेरे पति की मृत्यु हो गई। यह सारी घटनाएँ मेरे पति की मौत का कारण बनीं। पुलिस की ज्यादती, बर्बरता, लापरवाही और अत्याचार ने मेरा पूरा परिवार बरबाद कर दिया और मेरे मासूम बच्चों का भविष्य अंधकार में चला गया।
संघर्षरत पीड़ित अर्चना
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