मेरा नाम आयशा बेगम उम्र -32
वर्ष, है। मेरे पति का नाम सोनू उर्फ़ रफावत अली है। मैं गृहणी महिलाहूँ| मै मुसलमान जाति से हूँ| मेरे
तीन बच्चे हैं| मेरी एक बेटी और दो बेटे है|
मै ग्राम-खोरड़ीह, पोस्ट-सेमरा बरहो,
थाना-राजगढ़, तहसील-मड़ीहान, जिला-मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) की निवासी
हूँ| मेरे पति मजदूरी करके पूरे परिवार का भरण-पोषण करते है| मै
गरीब ज़रूर हैं,
लेकिन मेहनतकश हूँ|
21
जनवरी 2024
— जिस दिन से सब बिखर गया उस दिन दोपहर 11
बजे गाँव में फिरोज और गोपाल सिंह के बीच किसी लेन-देन को लेकर झगड़ा हुआ। गोपाल ने 112 पर कॉल कर पुलिस को बुलाया। देखते ही देखते गाँव में भीड़ जमा हो गई और पुलिस आ गई।मेरे पति घर पर नहीं थे। वो तो मुर्गा लेने कतवरिया गए थे। लेकिन रास्ते में रामपुरिया पुल के पास पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया, कहा कि पूछताछ करनी है। उन्हें गाड़ी में बैठाकर राजगढ़ थाने ले गए। हमारी मोटरसाइकिल भी जब्त कर ली।
शाम को जब मुझे उनके बारे में जानकारी मिली,
तो मेरे देवर बब्लू, भतीजा बाबु और मुसर्रफ थाने गये| लेकिन मिलने नहीं दिया गया।रात 9 बजे मेरे पति का कॉल आया, पूछे फिरोज कहाँ है? मैंने कहा मालूम नहीं। उन्होंने कहा पुलिस वाले कह रहे हैं कि अगर फिरोज मिल जाएगा तो छोड़ देंगे| लेकिन शायद वो झूठ बोल रहे हैं।मेरे छोटे-छोटे बच्चे पापा को ढूंढ़ते हुए रो रहे थे। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।उनके लिए कुछ पका नहीं पाई| उस रात मेरी रसोई नहीं जली।पुलिसवालों ने मेरे पति को बेरहमी से पीटा, डंडों से मारा।पूरी रात भूखे-प्यासे उन्हें थाने में रखा गया। न सोने दिया, न कोई दवा दी गई।रिश्तेदारों से मिलने भी नहीं दिया गया।22 जनवरी की सुबह पुलिसवालों ने धमका कर मेरे पति को जबरन एक कट्टा पकड़ा दिया। फिर फोटो खींची और उनके ऊपर फर्जी FIR
No. 16/2024
— IPC की धाराएं 147, 148, 307 ,
353, 323, 338, 504, 506 केस लगा दिया|
बिना जाँच
किये ही
मेडिकल कराकर
उन्हें मिर्जापुर जिला जेल भेज दिया गया।जब मैं मिर्जापुर जेल में मिलने पहुँची| मेरे पति मुझसे लिपट कर रोने लगे। बोले जल्दी मुझे यहाँ से निकलवाओ नहीं तो ये लोग काम कराते-कराते मेरी जान ले लेंगे। उन्हें शौचालय की नाली साफ कराई जाती थी, इतनी बदबू होती कि रोटी खाना भी मुमकिन
नहीं था।काम न करने पर पीटा जाता, और पैसा मांगा जाता
हम गरीब हैं, कहाँ से लाते पैसा? हमने सब कुछ बेच दिया| बस एक इंसाफ के लिए मेरे मायके
वालों और रिश्तेदारों ने जब कोई मदद नहीं की तोअपने गहने,
मंगलसूत्र और जेवर बेच दिए।बहन से ₹20,000
उधार लिया।मेरे ससुर लियाकत अली ने अपनी 10
बिस्सा ज़मीन बेच दी।तब जाकर हाईकोर्ट से जमानत करवाई।करीब 1.5
महीने बाद, मेरे पति जेल से रिहा हुए।
लेकिन हमारे दुखों की कोई सीमा नहीं थी| जमानत के कुछ ही समय बाद पुलिस ने मेरे पति को फिर तंग करना शुरू किया।अब वो बनारस में ईंट-गारा का काम करते हैं।मेरे बच्चे हर रात मुझसे पूछते हैं | मम्मी,
पापा कब आएँगे?"मैं उनके सवालों का जवाब नहीं दे पाती।मेरी नींद उड़ चुकी है, मेरे सपने बिखर चुके हैं।हमारा परिवार बिखर गया है| लेकिन हमारी उम्मीद अब भी ज़िंदा हैहमारी गलती सिर्फ इतनी थी कि हम गरीब हैं।हमारा जुर्म सिर्फ इतना है कि हम मजदूर हैं।लेकिन क्या इस देश में गरीब होना अपराध है?हम चाहते हैं –
न्याय मिले।हम चाहते हैं कि इस फर्जी केस की निष्पक्ष जांच हो।जिन पुलिसवालों ने ज़ुल्म किया, उन पर सख्त कार्रवाई हो।हमारे जैसे गरीबों को बेवजह ना फंसाया जाए।
आज जब मैंने अपनी बात लिख पाई हूँ, तो दिल थोड़ा हल्का जरूर हुआ है| लेकिन तब तक चैन नहीं मिलेगा जब तक मेरे परिवार को इंसाफ नहीं मिल जाता।
आयशा बेगम
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