मेरा नाम सरोज देवी उम्र- 38
वर्ष, है| मैं मुसहर जाति से हूँ। मेरे पति का नाम काजू बनवासी है। मेरी दो बेटियाँ हैं,
जिनमें से एक की शादी हो चुकी है। अपने परिवार का गुज़ारा करने और बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए मैं झाडू पोछा का काम करती हूँ। मैं ग्राम तिलमापुर,
पोस्ट सारनाथ, तहसील भोजुबिर, जिला वाराणसी की निवासी हूँ।
20 फरवरी, 2023
की सुबह करीब 10
बजे का वह दिन आज भी मेरी रग-रग में कांपता है। दबंग बलराम यादव और प्रधान सतीश के लोग JCB और डंपर लेकर करीब 10–12 मजदूरों के साथ हमारे गाँव पहुँचे। बिना किसी चेतावनी के उन्होंने मेरे और मेरे पड़ोसियों के कच्चे घर तोड़ने शुरू कर दिए।मैं दौड़ी,
चिल्लाई,
रोई, लेकिन मेरी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था। उस समय घर पर कोई पुरूष सदस्य नहीं था। महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग तो खेतों और मजदूरी पर गए हुए थे। दबंगों ने न सिर्फ हमारे घर तोड़े बल्कि हमें गालियाँ दीं, धमकियाँ दीं और हमारी बेबसी पर हँसे। जब JCB ने मेरा घर गिराना शुरू किया तो मेरी चीखें और मेरी आँखों से बहते आँसू भी उन्हें रोक नहीं पाए। दरवाज़े,
बर्तन, चूल्हा, बच्चों के खिलौने सब बिखर गए। कई घरों का अनाज और ज़रूरी सामान नहर में फेंक दिया गया। मैंने देखा कि वे बर्तन, चावल और कपड़े लूटकर ले जा रहे थे, जैसे हमारे दर्द का भी कोई मोल न हो।
पड़ोस के घरों में भी यही क्रूरता हुई। हमारी बहनों के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया और धमकाया गया कि अगर किसी ने आवाज़ उठाई तो गाँव से गायब कर देंगे। उस पल मेरे मन में सिर्फ़ यही सवाल गूंज रहा था| मेरे छोटे-छोटे बच्चों का क्या होगा? रातों-रात हमारा जीवन, हमारी इज्जत और हमारी मेहनत की पूँजी मिट्टी की तरह बिखर गई। करीब 2–3
घंटे तक यह तोड़फोड़ चलती रही। गाँव के कुछ लोग गवाह बने पर कोई मदद के लिए आगे नहीं आया। जब दबंग चले गए, तब गाँव वाले लौटे, लेकिन उनकी आँखों में भी वही बेबसी और टूटन थी।
हमने थाने में शिकायत की,
लेकिन पुलिस ने हमारी नहीं सुनी। हमें लगा कि पुलिस और अधिकारी भी दबंगों के पैसे से खरीदे गए हैं। तहसील और कचहरी में भी गुहार लगाई,
लेकिन वहाँ भी सिर्फ़ वादे सुनने को मिले “जमीन का समाधान होगा”। हमारे जीवन के लिए वादों का सहारा कैसे बन सकता है? रातों की नींद अब भी छिन जाती है। डर बना रहता है कि कहीं वे लोग फिर से न आ जाएँ और हमें या हमारे बच्चों को नुकसान न पहुँचा दें।
हम गरीब मजदूर लोग हैं। न सरकारी सुविधाएँ हैं,
न राशन कार्ड, न शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएँ। पेट की लड़ाई में यह सब अधूरा रह गया। हमारी मांग सिर्फ इतनी है कि हमारी पुश्तैनी ज़मीन की जाँच हो और हमें उसका हक़ वापस मिले। दबंग बलराम यादव और प्रधान सतीश के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। हमें पक्के मकान और अपनी ज़मीन का पट्टा मिले ताकि हमारा भविष्य सुरक्षित हो सके।
आज हमारे दिल में केवल एक ही बात रह गई है—“हम भी इंसान हैं।” हम चाहते हैं कि कोई हमारी आवाज़ सुने, हमारी पीड़ा समझे और हमें इंसाफ़ दिलाए।
मैं,
अदालत अधिकारियों और समाज से यही विनती करती हूँ हम गरीब मुसहरों की भी कोई पहचान, कोई घर और कोई सुरक्षित भविष्य हो। बस यही हमारी आख़िरी उम्मीद है।
“70 साल की राधिका की पुकार – पुश्तैनी ज़मीन से हमें मत उजाड़ो”
मेरा नाम राधिका उम्र-70 वर्ष,
है|| मेरे पति स्व. हलचल है| मेरे पति अब इस दुनिया में नहीं हैं। मैं ग्राम- तिलमापुर,
पोस्ट- सारनाथ, थाना- वाराणसी की स्थायी निवासी हूँ। मेरे दो बेटे और एक बेटी है। एक बेटे और बेटी की शादी हो चुकी है। छोटा बेटा 25 वर्ष, का है। हम सब मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं।
करीब सुबह 10
से 12
बजे का समय था। हम सभी अपने घर-गृहस्थी के काम में लगे हुए थे। तभी गाँव के दबंग लोग बलिराम यादव और सतीश (पूर्व प्रधान) कुछ साथियों के साथ हमारे घर पर आ धमके। यह दबंग लोग हमेशा हमारे जैसे बनवासी और मुसहर परिवारों को धमकाते रहते हैं।उस दिन भी उन्होंने हमें डरा-धमकाकर कहा
“तुम सब मुसहर लोग यहाँ नहीं रह सकते। यह जमीन हमारी है। अपनी झोपड़ियाँ हटाओ,
नहीं तो बुलडोज़र लाकर सब कुछ गिरा देंगे।”हम लोगों ने हाथ जोड़कर कहा
“यह जमीन हमारी है। हम लोग यहाँ 5–6 पीढ़ियों से रह रहे हैं। यह हमारी पुश्तैनी ज़मीन है। हमारे घर-आँगन, झोपड़ी और जीवन यहीं पर बसे हैं।”
लेकिन बलिराम और सतीश ने एक न सुनी। उल्टा गालियाँ देने लगे और बोले
“अगर हमारी बात नहीं मानोगे, तो तुम सबको जान से मार देंगे। कोई तुम्हारी मदद नहीं करेगा। हम बुलडोज़र से तुम्हारा सब कुछ तोड़ देंगे।”दबंगों ने खुलेआम धमकी दी कि “तुम लोग चाहे कुछ भी कहो, यहाँ तुम्हें अब नहीं रहने देंगे। तुम्हारा जो भी घर-झोपड़ी है, सब उजाड़ देंगे। अगर विरोध करोगे तो अंजाम बहुत बुरा होगा। उनकी ये बातें सुनकर हम सभी बेहद भयभीत हो गए। परंतु हमारे पास जाने के लिए और कोई जगह नहीं है। हम गरीब लोग मेहनत-मजदूरी करके अपने बच्चों का पेट पालते हैं। हमारी पूरी जिंदगी इसी मिट्टी, इसी ज़मीन से जुड़ी है। यही हमारे पूर्वजों का बसेरा रहा है।
इन दबंग लोगों की करतूतें यहीं तक सीमित नहीं हैं। वे जब चाहें, हमारे घरों पर आते हैं, गाली-गलौज करते हैं और धमकी देते हैं। अगर हम कोई छोटा-मोटा निर्माण करने लगते हैं तो तुरंत रोक देते हैं और कहते हैं –“बुलडोज़र लाकर सब गिरा देंगे।”इतना सब सहने के बाद भी अगर हम चुप रहें, तो वे कहते हैं
“तुम सबको कोई नहीं सुनेगा, कोई मदद नहीं करेगा। जो यहाँ रहना चाहेगा, उसका अंजाम बहुत बुरा होगा।”हमारा दिल दहल जाता है। लेकिन हम जानते हैं कि यह जमीन हमारी पुश्तैनी है। हमारी पाँच-छह पीढ़ियों से यही घर-बार है।
हमारी माँग हमें इस जमीन का कानूनी पट्टा दिया जाए, जिससे कोई भी दबंग हमें उजाड़ न सके।दबंगों द्वारा हमारे साथ किए जा रहे अत्याचार और धमकियों को रोका जाए।हमें और हमारे परिवारों को सुरक्षा और न्याय प्रदान किया जाए।
यह है मेरी और मेरे जैसे दर्जनों गरीब परिवारों की पीड़ा। हम इंसाफ़ की आस में बार-बार अधिकारियों के दरवाज़े खटखटा रहे हैं। हमारी पुकार है कि हमें हमारी पुश्तैनी ज़मीन पर शांति से जीने दिया जाए।
“बुलडोज़र ने तोड़ी दीवारें नहीं,
हमारी पीढ़ियों
की सांसें तोड़ दीं”
मेरा नाम ज्ञानी देवी उम्र - 27
वर्ष है। मेरे पति का नाम चन्द्रिका वनवासी है। मेरे तीन नन्हे नन्हे बच्चे हैं जिनकी भरी हुई आँखों में मेरी दुनिया बसती है। हम सब तिलामापुर के उसी छोटे से मुसहरो के क़स्बे में रहते हैं जहाँ चार पीढ़ियों से हमारी ज़िंदगी गुज़र रही है। यह जमीन हमारी माँ-बहनों की दादा-दादी की
हमारी पहचान की जड़ है| यहाँ हमारी हँसी हमारे संस्कार हमारे दर्द सब कुछ रचा-बसा है। हम बनी मजदूरी करते हैं और उसी मेहनत से अपने घर का पेट भरते हैं।
27 फरवरी, 2023 की सुबह मेरी ज़िन्दगी का सबसे डरावना और निंदनीय दिन बन गया। उस दिन शाम नहीं जैसे हमारे सारे सपने और यादें एक-एक करके बुलडोज़र की दहाड़ से धराशायी हो गईं। उस बंजर जमीन पर मेरे 12
परिवार रहते हैं चार पीढ़ियों की मिट्टी मेरी पुस्तैनी झोपड़ियाँ पास ही एक सूखा पोखरा है| उसी के पास बलिराम यादव का स्कूल चलता है। कुछ लोग भू-माफिया, जिनके नाम ही हमारे गाँव में सनसनी बन चुका हैं| उन्होंने ने ठान लिया था कि यह जमीन किसी भी कीमत पर छीननी है। सतीश पांडे,
जो 'प्रधान' कहलाते हैं और जमीनों का लेन-देन करते दिखते हैं, और बलिराम यादव इन दोनों की मिलीभगत ने हमारी शांति और अस्तित्व को निशाना बनाया। उन्होंने मिलकर अचानक हमारे घरों पर बुलडोजर चला दिया।
उन्होंने मेरे घरों की दीवारों, चूल्हों को ढहा दिया| उन्होंने हमारे यादों को हमारी ढेर सारी पीढ़ियों की पहचान को कुचल दिया।मैं पति चन्द्रिका और पूरे मोहल्ले ने रो-रोकर उनसे पूछा “ये कहाँ जाएँगे? हम बचपन से यहाँ हैं। उनका जवाब कठोर और बेदर्द था|
यहाँ से चले जाओ। इनको काशीराम आवास दे दिया जाएगा| जमीन खाली कर दो। हमारे पास कोई कागज़ नहीं था| हम मुसहर हैं| शिक्षा और जानकारी की कमी का शिकार रहे हैं| जिससे ये दबंग लोग फायदा उठा रहे हैं। हमारे पास जो एक-एक घर है| वो हमारी मेहनत और उम्मीदों का घर था| आज वह ढेर हो गया।
हम कचहरी में भी गए जहाँ कागज़ों की झोली मिली और खसरा-खतौनी की बातें हमारी समझ से ऊपर थीं। हमारे पास कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं है| हमारी जमीन की जड़ें जिनमें हमारे पूर्वज दफन हैं, क्या उनके कागज़ नहीं होते? क्या हमारी जड़ों की गूँजन अदालत के दरवाजे पर गूँज नहीं सकती
उन लोगों ने न केवल घर गिराए वे धमकी भी दे रहे हैं कहते हैं कि जमीन पेड़ों तक घेरवा देंगे|
हमें देखा जाएगा कि हम क्या कर पाते हैं। हम अक्सर सीज़न आने पर जाल्हुपुर ईट भट्ठे पर चले जाते हैं| बाकी दिनों में शहर में छोटी-मोटी मजदूरी करते हैं| आज डर ने हमारी कमर तोड़ दी है। पेट भरा रखना और दबंगों से भिड़ना यह दो राहें हैं| जिनमें से किसी एक को चुनना हमारे लिए एक मुश्किल है। दिल कहता है हम अपनी पुस्तैनी ज़मीन नहीं छोड़ेंगे। हमारा संघर्ष सिर्फ़ जमीन का नहीं, हमारी इज़्ज़त हमारी पहचान हमारे बच्चों के भविष्य का है।
मैंने कचहरी का रास्ता अपनाया पर कागज़ों के बिना हमारे लिए लड़ाई और भी कठिन हो गई। फिर भी हम पीछे नहीं हट रहे हम चाहते हैं कि या तो इसी जमीन के बदले हमें वैध ज़मीन दी जाए या किसी तरह हमारा अधिकार लिखित रूप में सुनिश्चित किया जाए| जिससे कोई भी हमें बेदखल न कर सके। हम न्याय की उम्मीद में इस दुनिया में जी रहे हैं हमें बस यह चाहिये कि कोई हमारी बात सुने| हमारी आवाज़ को समझे और हमारे साथ खड़े हो।
जो भी यह कहानी पढ़ रहा है| मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करती हूँ| हमारी सुनवाई कराइए हमें वह सुरक्षा दिलाइए जो हर इंसान का अधिकार है। मिट्टी हमारी है हमारे पूर्वजों ने जो जीवन उस पर बिता दिया| उसका सम्मान कराइए। हम भ्रष्ट दबंग सत्ता के आगे नहीं झुकेंगे पर हमें मदद की ज़रूरत है। हम व्यथा लिखकर बोलकर थोड़ी सुकून महसूस कर रहे हैं कि कहीं हमारी आवाज़ पहुँचेगी और कहीं से हमारी मदद होगी।
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