Thursday, February 5, 2026

मेरी आवाज़ — एक सफाई कर्मी की दास्ताँ

 

मेरा नाम लक्ष्मी नारायण, उम्र-42 वर्ष है| मै ग्राम- मेहदीगंज सैदा, थाना- मिर्जामुराद, तहसील राजातालाब, वाराणसी, की निवासी हूँ| मेरे पिता स्व. मेवा लाल का आशीर्वाद मेरे साथ था| उनके बिना भी जीवन चल रहा है। घर में मेरी एक बेटा और एक बेटी है। मैं सफाई कर्मी हूँ|  इसी कमाई से हमारा घर चलता है| बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च चलता है। हमारी ज़िन्दगी सादगी और मेहनत से गुज़री है|  जितना कमाते हैं, उतना ही चलाते हैं।

31 मई, 2023 की शाम वो दिन है जिसे मैं आज भी आँखें बंद करके याद करता हूँ। गाँव के मैजिक वाले  अजय कुमार पटेल  की एक छोटी गाड़ी और रास्ते में चल रहे एक ट्रक की टक्कर नहीं हुई, पर ट्रक ने साइड मार दिया और मैजिक क्षतिग्रस्त हो गयी। पैसों को लेकर दोनों पक्षों में बहस हो गयी। अजय के बड़े पिता के लड़के प्रकाश ने प्रधान को फोन करके बुला लिया वहीं ट्रक वाले ने 112 पर पुलिस बुला ली। प्रधान ने समझदारी दिखाई और दोनों की बात-चीत कर समझौता करा दिया।

परन्तु उस शाम कुछ और ही मोड़ ले गया। पुलिस चौकी का एक सिपाही प्रधान को रोककर कहने लगा| साहब रहे हैं, मिलकर जाना। फिर मिर्जामुराद से एसओ आये। सबसे पहले उन्होंने जय हिंद करके नमस्ते किया| थोड़़ा सीरिमनी जैसा हुआ लोग एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे। पर हाँ, हवा बदल गयी किसी ने सोचा भी नहीं था कि वही हाथ जो नमस्ते कर रहा था, कुछ ही देर में लाठी उठाकर मारने लगेगा।

बिना किसी वजह के  प्रधान को बचाने के चक्कर में पुलिस ने मुझे भी पकड़ लिया और बेरहमी से पीटा। मेरी पीठ, मेरे हाथ सब लाठी के निशान से भर गये। मेरी मोटरसाइकिल को मैजिक में लादकर थाने ले जाया गया और हमारी मोबाइल फोन पहले ही पुलिसवालों ने छीन लिये थे। हम घर को किसी को खबर नहीं दे सके| कोई फोन नहीं, किसी को कुछ नहीं पता। थाने ले जाते समय पुलिस वालों ने जीप में धमकी दी कि अगर बोले तो और परेशान कर देंगे।थाने में रात भर हमें हवालात में रखा गया। रात में खाना नहीं मिला कई घंटे बिना पानी-मगर की तकलीफ उठानी पड़ी। पुलिस ने हमें सोने तक नहीं दिया। वहाँ की अभद्र भाषा, अपमान, गालियाँ हर बात में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया। उनका मन बन गया था कि हम सरकारी हथियार की लूट में शामिल हैं और बड़े-बड़े अपराधों के तहत केस दर्ज़ करने की धमकी दी गयी। उनके मुख से निकला, “पुलिस पर अत्याचार करते हो, गुंडा बनते हो, चलो बन्दूक छिनने का केस लगायेंगे”—ये शब्द मैंने कभी नहीं सोचे थे किसी के लिए सुनूँगा।

अंततः पुलिस ने शांति-भंगका चालान कर दिया। वे बिना सोचे-समझे हमें यातना दे रहे थे, हर बात में गालियाँ दे रहे थे, हर इज्ज़त तोड़ रहे थे। जब रात कटी और अगली सुबह बहीनी हुई, 1 जून 2025 को हमारी जमानत हुई। जमानत की वह घड़ी भी एक तरह का ताज़ा ज़ख्म थी| क्योंकि आज भी हमारे कानों में उन अपमानजनक शब्दों की गूँज रहती है और बदन पर जो निशान हैं, वे याद दिलाते रहते हैं कि सुरक्षा की हिफाज़त करने वाले कभी-कभी हीनता का कारण बन जाते हैं।

मैं जानता था कि पुलिस का मतलब समाज में सुरक्षा और न्याय है पर अब मुझे समझ गया कि वह सिर्फ दस्तावेज़ों और कागज़ों में सिमटा हुआ विश्वास बनकर रह गया है। हम लोगों की दास्ताँ सुनकर शायद लोगों को लगेगा कि मैं ज़्यादा भावुक हो रहा हूँ, पर जो मारपीट, डर और अपमान मैंने झेला, वो शब्दों में सौ फीसदी बयां करना भी मुश्किल है। उस रात मेरा लालटेन बुझ गया था| सिर्फ मेरे हाथ पर चोटें आईं, बल्कि आत्मसम्मान पर भी गहरे घाव हुए।आज जब मैं अपने बेटे और बेटी को देखता हूँ, तो कोशिश करता हूँ कि उनकी आँखों में डर आए। मैं काम पर फिर गया, झाड़ू, कूड़ा, सफाई  वही रोज़ की जिन्दगी पर अब मैं पहले से सावधान, पहले से सचेत और पहले से ज्यादा घृणा के साथ उन लम्हों को याद करता हूँ, जब इंसानियत शर्मसार हुई थी। मैं यह कहानी इसलिए लिख रहा हूँ ताकि कोई और उस रात की तरह फंसे तो किसी को पता चले कि कोई भी आदमी, चाहे वह कितना भी छोटा काम क्यों करे, अधिकारों और इज्ज़त का हक़दार होता है।

हमारी छोटी-सी दुनिया में जो भरोसा बचा है, उसे बचाने की ज़िम्मेदारी हम सबकी है। पुलिस का एक अरमान था| लोग बचें, समाज बचें  पर जब वही हाथों में डंडा लेकर गलत दिशा में झुक जाएं, तो कागज़ों पर लिखी व्यवस्था ही क्या काम की? मैं बस इतना चाहूँगा कि मेरे जैसे किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा हो और अगर हुआ भी तो उसकी आवाज़ आए; उसे दबाया जाये।


        यह कहानी सिर्फ़ मेरी नहीं, उन सबकी है जो सत्ता की मनमानी के शिकार हुए

मेरा नाम मुकेश पटेल, उम्र- 46 वर्ष है। मेरे पिता स्वर्गीय सुखराम थे। मैं जाति का पटेल हूँ। मेरे दो बेटे हैं। मैं कृषि से जुड़ा हूँ। मेरा गाँव नागपुर, पोस्ट बेनीपुर, थाना मिर्जामुराद, तहसील राजातालाब, जनपद वाराणसी का निवासी हूँ। जिस घटना ने मेरी ज़िंदगी हिला कर रख दी, वह रात 1 जून 2023, लगभग रात 10:00 बजे की है  वह रात जिसे मैं आज भी सपनों में देखता हूँ और जिसकी तस्वीरें मेरी आँखों से नहीं मिटतीं।

वो रात रिंग रोड के पास थी। मेरे गाँव के ही अजय (पुत्र: पंचम पटेल) की ट्रक ने साइड मारी थी। इस बात को लेकर ट्रक ड्राइवर और एक मैजिक ड्राइवर के बीच विवाद हो गया। धीरे-धीरे गाँव के लोग भी इकट्ठा होने लगे और माहौल तनावपूर्ण हो गया। मुझे घटना की सूचना जयप्रकाश पटेल (पुत्र: नंदलाल) ने फ़ोन पर दी। सूचना पाकर मैं भी मौके पर पहुँचा। मैं वहाँ पहुँच कर दोनों पक्षों से समझौता कराने की कोशिश कर रहा था। मेरा यही इरादा था कि गाँव का मामला है, आपसी समझ से निपटा लें।ठीक उसी समय चौकी इंचार्ज खजूरी भी मौके पर पहुँचे। मैंने समझौता कराने की बात कही तो उन्होंने विरोध शुरू कर दिया। कुछ देर बाद उन्होंने दबाव बढ़ाया कि दोनों पक्षों को चौकी पर जाना होगा, परन्तु मैंने कहा कि लोग समझौता कर चुके हैं, दोनों पक्ष अपने-अपने घर चले जाएँ। तब चौकी इंचार्ज ने कहा कि जब तक एसओ साहब (थानाध्यक्ष) नहीं आते, तब तक रुके रहें। हम सब वहीं रुके रहे और लगभग 20 मिनट बाद एसओ साहब अपनी जीप से आए।

एसओ और उनके साथियों ने उतरते ही समझौते को नज़रअंदाज़ कर दिया और पुलिस दल-बल को आदेश देकर हम पर जानलेवा हमला कर दिया। अचानक ही पुलिस ने हमें पीटना शुरू कर दिया। मैं वहीं खड़ा हुआ था, समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है। वे हमें उठाकर जबरन जीप में धकेलने लगे। मेरा साथी लक्ष्मी नारायण (पुत्र: मेवा लाल) जब विरोध करने लगा तो उसे भी पकड़कर ज़बरदस्ती जीप में बैठा लिया गया। जीप में भी हमें लात-घूंसे और डंडों से मारते रहे और गालियाँ दीं। मेरा सफारी वाहन — UP 65 KM 478 का बोनट और साइड शीशा तोड़ दिया गया। हमारी गाड़ी को किसी दूसरी गाड़ी से टक्कर देकर घसीटा गया और फिर हमें थाने ले जाया गया।

थाने ले जाने के बाद पहले हमें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) ले जाकर मेडिकल कराया गया, पर वहाँ भी हमारी इज़्ज़त की परवाह किसी ने नहीं की। फिर वापस थाने लाकर गाड़ी से उतरते ही डंडों से बरसात की गयी। दो सिपाही डंडों के साथ आए और इतनी तेज़ी से मारने लगे कि ऐसा लग रहा था शायद आज हमारी जान नहीं बचेगी। हमें ज़मीन पर गिरा दिया गया और फिर हमें घसीटते हुए हवालात में बंद कर दिया गया। हवालात की बदबू, घुटती हुई साँसें, और उस रात का डर  सब कुछ आज भी मेरी रूह में गूंजता है। रात में ना खाना मिला, ना पानी। प्यास की वजह से गला सूखता रहा। हमारे मोबाइल भी जब्त कर लिए गए और किसी भी रिश्तेदार/गाँव वाले से मिलने की अनुमति नहीं दी गई। मैं रो-रो कर घर को याद करता रहा  अपनी पत्नी, बच्चों और गाँव को सोचकर मेरा दिल फट जाता था।

उस रात मैंने सोचा भी नहीं था कि जो व्यक्ति गाँव सेवा और समाज के हित में आगे आने की चाह रखता है, उसके साथ ऐसा बर्ताव होगा। चौकी इंचार्ज ने मुझसे 5,000 की माँग भी की थी। मैंने देने से इनकार किया। उन्होंने थानाध्यक्ष को बुलाया, परंतु जो आश्चर्य हुआ वह और भी भयानक था। थाना अध्यक्ष दीपक राणावत उस समय अपनी सगाई पर थे। मैंने सोचा कि मैं जाकर बधाई दे दूँगा, पर वह सुविधा हमें मिलने से पहले ही हम पर टूट पड़े। उनके आते ही हमें और बुरी तरह पीटा गया। पूरी रात हवालात में गुज़र गई डर, अपमान और असुरक्षा के बीच।

अगली सुबह जब संगठन और लोगों की संख्या बढ़ने लगी, तब जाकर हमें हवालात से बाहर निकाला गया। बाहर आने पर मैंने देखा कि मेरे गाँव के लोग, रिश्तेदार और संगठन के लोग मेरे पास थे। उनकी आँखों में चिंता और दर्द भी था। जब बाहर गया तो लोगों के बीच कुछ विरोधी भी थे, जो मेरी बदनामी कर रहे थे। मेरे मन पर दाग लग गया। मैं जो ग्राम प्रधान था और समाज के लिए काम करता था, अब खुद बदनाम हो गया था। हमारे सफारी की मरम्मत पर कुल 22,000 का खर्च आया। गाड़ी का चलन (जो मैंने बताया) 3,600 का ठेस लगा। करीब 10-12 लोगों की बाइकों को भी पुलिस ने जब्त कर लिया तथा कई बाइकों को तोड़-फोड़ भी किया गया।

सबसे दुख की बात यह रही कि पूरी घटना के बाद गलत ढंग से मेरे ऊपर मुक़दमा दिखा दिया गया। मेरे सफारी वाहन से ट्रक ड्राइवर के विवाद को मेरे खिलाफ दर्शाकर 107/16 में चालान कर दिया गया (जिसका अर्थ और प्रभाव न्यायिक तरीक़े से हमारे ऊपर भारी पड़ा) जबकि असल विवाद ट्रक ड्राइवर और मैजिक ड्राइवर के बीच था और मैं वहाँ समझौता कराने गया था। मैं और मेरे साथ जो लोग थे, हम बेगुनाह थे, फिर भी पुलिस ने हमें पीटा, बेरहमी से हवालात में डाला और हमारी संपत्ति को क्षतिग्रस्त कर दिया।

उस दिन के बाद मेरी ज़िंदगी बदल सी गई। रातों की नींद छिन गई। बार-बार वह बर्बरता आँखों के सामने आती है। कभी-कभी सपनों में भी वही दृश्य लौट आता है और मैं डर के मारे सो भी नहीं पाता। गाँव में लोग बातें करते थे, कुछ सहानुभूति दिखाते थे तो कुछ विरोधी तत्व हमारी छवि बिगाड़ने में लगे रहे। मैंने जो जनसेवा का मन बनाकर ग्राम प्रधान का पद संभाला था, उसकी इज़्ज़त पर ठेस पहुँची। मेरे परिवार को भी अत्यधिक मानसिक कष्ट सहना पड़ा।

मैं यह नहीं चाहता कि किसी और इंसान के साथ भी ऐसा घृणित व्यवहार हो। नौकरी और ज़िम्मेदारी के नाम पर जो ताकत मिली है, उसका इस्तेमाल अधिकार के लिए होना चाहिए, उत्पीड़न के लिए नहीं। मेरे परिजनों, मेरे समाज और मेरे गाँव के लोगों का भी जीवन दूभर हो गया है। हमें न्याय, सम्मान और सुरक्षा चाहिए।

यह कहानी सिर्फ़ मेरे दर्द की नहीं है, यह उन सभी परिवारों की कहानी है जिन्हें कभी-कभी बिना वजह ही सत्ताधारियों की मनमानी का शिकार होना पड़ता है। मैं अपनी आवाज़ उठाता हूँ ताकि सच्चाई सामने आए और न्याय हो। मेरा भरोसा है कि अगर ईमानदारी से जाँच होगी तो सच ज़रूर उभर कर आएगा और जिम्मेदारों को सज़ा मिलेगी।

                                                                                                          

 

                                                                                                                                            

 

 

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